KATHAAYA
🌐 हिन्दी

गंगा ने अपने सात पुत्रों को नदी में क्यों बहाया? महाभारत की कथाGanga Shantanu katha

महाभारत के अनुसार गंगा ने जन्म लेते ही सात पुत्रों को नदी में क्यों डाला? वसुओं के शाप, शांतनु की शर्त और देवव्रत की पूरी कथा, स्रोत सहित।

KATHAAYA संपादकीय टीम··6 मिनट पढ़ें
नदी से प्रकट होती गंगा, राजा रवि वर्मा शैली का AI-निर्मित चित्र
चित्र: AI-निर्मित

शांतनु और गंगा की कहानी में सबसे चुभने वाला सवाल यही है: एक माँ अपने नवजात बच्चों को नदी में कैसे डाल सकती है? महाभारत के आदि पर्व में इसका जवाब एक शाप, एक चोरी हुई गाय और एक वचन के भीतर छिपा है। नीचे वही क्रम है जो ग्रंथ में आता है, और जहाँ पाठ चुप है वहाँ हम भी चुप हैं।

प्रतीप की दाहिनी जाँघ पर बैठी स्त्री

कथा शांतनु से पहले उनके पिता प्रतीप से शुरू होती है। राजा प्रतीप गंगा के स्रोत के पास तपस्या कर रहे थे, तभी एक रूपवती स्त्री जल से निकलकर उनकी दाहिनी जाँघ पर आ बैठी। उसने कहा कि वह उन्हें पति के रूप में चाहती है। प्रतीप ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वे पराई स्त्री की ओर कामना से नहीं देखते, और दाहिनी जाँघ बेटी या बहू के बैठने की जगह है, पत्नी की जगह बायाँ गोद है। इसलिए वे उसे अपने पुत्र की पत्नी के रूप में स्वीकार करेंगे। यही स्त्री गंगा थी, और यहीं से शांतनु के साथ उसका संबंध तय हुआ।

विवाह और वो शर्त

बाद में शांतनु राजा बने और गंगा उनसे मिलीं। विवाह से पहले गंगा ने एक ही शर्त रखी: राजा उसके किसी काम में दख़ल नहीं देंगे, चाहे वह उन्हें अच्छा लगे या बुरा, और उससे कभी कठोर बात नहीं कहेंगे। जिस क्षण राजा ने टोका या कड़वा बोला, वह उन्हें छोड़कर चली जाएगी। शांतनु ने शर्त मान ली। ग्रंथ के अनुसार वे उसके स्वभाव, रूप और सेवा से इतने प्रसन्न थे कि महीने, ऋतुएँ और साल बीतते गए और उन्हें पता ही नहीं चला।

कथा का क्रम · THE SEQUENCE
  1. 1

    प्रतीप और गंगा

    दाहिनी जाँघ बेटी या बहू की जगह है, इसलिए गंगा पुत्र की पत्नी बनेंगी।

  2. 2

    शांतनु की शर्त

    राजा कभी उनके किसी काम में दख़ल नहीं देंगे।

  3. 3

    आठ संतानें

    सात को गंगा ने जन्म लेते ही नदी में डाल दिया।

  4. 4

    आठवें पर टोक

    शांतनु ने रोका और पूछा कि वे कौन हैं।

  5. 5

    गंगा का सच

    वे आठ वसु थे, जो वशिष्ठ के शाप से मनुष्य बने।

  6. 6

    देवव्रत

    आठवाँ बालक गंगेय और देवव्रत कहलाया।

आठ संतानें और नदी

इस विवाह से आठ तेजस्वी संतानें हुईं। पर हर बार जन्म के तुरंत बाद गंगा बच्चे को नदी में डाल देतीं और कहतीं, “यह तुम्हारे भले के लिए है।” शांतनु यह देखकर दुखी होते, मगर कुछ नहीं बोलते, क्योंकि उन्हें डर था कि पत्नी उन्हें छोड़ देगी। सात बार ऐसा हुआ।

आठवें बच्चे के जन्म पर शांतनु से रहा नहीं गया। उन्होंने उसे रोकते हुए पूछा कि वह कौन है, अपनी ही संतानों को क्यों मार रही है, और यह कितना बड़ा पाप है। यही वह क्षण था जिसकी शर्त गंगा ने पहले रखी थी।

गंगा का उत्तर: वे आठ वसु थे

गंगा ने बच्चे को नहीं मारा, पर बताया कि शर्त पूरी हो चुकी है और अब वे जा रही हैं। उन्होंने अपना परिचय दिया कि वे जह्नु की पुत्री गंगा हैं। जिन आठ बच्चों को उन्होंने जन्म दिया, वे आठ वसु थे, जिन्हें वशिष्ठ के शाप से मनुष्य के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। पृथ्वी पर शांतनु जैसा कोई पिता और गंगा जैसी कोई माँ उनके लिए उपयुक्त नहीं थी, इसलिए यह संबंध बना। साथ ही वसुओं से यह तय हुआ था कि जन्म लेते ही गंगा उन्हें मनुष्य-जीवन से मुक्त कर देंगी।

शाप किसने दिया और क्यों

शांतनु के पूछने पर गंगा ने पूरी कथा सुनाई। मेरु पर्वत के पास वशिष्ठ (जिन्हें यहाँ अपव भी कहा गया है) का आश्रम था, जहाँ उनकी कामधेनु जैसी गाय नंदिनी रहती थी। एक दिन वसु अपनी पत्नियों के साथ वहाँ घूमने आए। द्यौ नाम के वसु की पत्नी ने नंदिनी को देखा और अपनी सखी के लिए उसे माँग लिया। द्यौ ने अपने भाइयों के साथ मिलकर गाय चुरा ली, यह भूलकर कि वह एक तपस्वी की संपत्ति है।

वशिष्ठ ने ध्यान से सब जान लिया और क्रोध में शाप दिया कि वसु पृथ्वी पर जन्म लेंगे। वसुओं ने क्षमा माँगी। ऋषि ने कहा कि बाकी वसु जन्म के एक वर्ष के भीतर मुक्त हो जाएँगे, पर जिसकी वजह से यह अपराध हुआ, यानी द्यौ, उसे पृथ्वी पर लंबे समय तक रहना होगा। वह धर्मज्ञ और शास्त्रों का ज्ञाता होगा, पिता का आज्ञाकारी होगा, पर उसकी संतान नहीं होगी।

सात को मुक्ति, आठवाँ देवव्रत

वसुओं ने गंगा से ही यह वरदान माँगा था कि जन्म लेते ही उन्हें जल में डालकर मनुष्य-जीवन से छुड़ा दिया जाए। इसलिए गंगा ने वैसा किया। केवल द्यौ को लंबे समय तक पृथ्वी पर रहना था। गंगा शिशु को लेकर चली गईं और बच्चा गंगेय तथा देवव्रत नाम से बड़ा हुआ। यही बाद में भीष्म कहलाए, जो आगे महाभारत की कथा के केंद्र में रहते हैं।

इस कथा से हम क्या सीखते हैं

पहली बात, पाठ में गंगा को क्रूर नहीं दिखाया गया है। वे वचन निभा रही हैं, और शांतनु की चुप्पी भी उसी वचन से बँधी है। दूसरी बात, यह कथा शाप और मुक्ति की है, हत्या की नहीं: वसुओं को ही जल्दी मुक्ति चाहिए थी। तीसरी बात, इसके ब्योरे अलग-अलग परंपराओं और पुनर्कथनों में थोड़े भिन्न मिलते हैं, इसलिए टीवी धारावाहिक या लोक-कथा से पढ़ी बातों को ग्रंथ के पाठ से मिलाकर देखना अच्छा रहता है। यहाँ हमने के. एम. गांगुली के अंग्रेज़ी अनुवाद के आदि पर्व (संभव पर्व) खंड ९७ से ९९ को आधार बनाया है।

प्रश्नोत्तरी · QUIZ

गंगा के आठवें पुत्र का दूसरा नाम क्या था?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या गंगा ने अपने बच्चों को मारा? पाठ के अनुसार उन्होंने जन्म के तुरंत बाद सात शिशुओं को नदी में डाला, पर यह वसुओं के अपने अनुरोध पर शाप से मुक्ति के लिए था।

आठवें पुत्र को क्यों बचाया गया? शांतनु ने टोक दिया, और वचन के अनुसार गंगा को जाना पड़ा। साथ ही शाप के अनुसार द्यौ को पृथ्वी पर लंबे समय तक रहना था।

वह आठवाँ पुत्र कौन था? गंगादत्त, गंगेय या देवव्रत, जो आगे भीष्म के नाम से जाने गए।

क्या यह कथा सभी ग्रंथों में एक जैसी है? नहीं। यह महाभारत के आदि पर्व का वृत्तांत है, और अन्य पुराणों और लोक-परंपराओं में ब्योरे अलग मिलते हैं।

साझा कीजिए:WhatsAppFacebookX