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कर्ण का जन्म: कुंती ने अपने पहले पुत्र को नदी में क्यों बहाया? महाभारत की कथाkarna birth kunti katha

महाभारत के आदि पर्व के अनुसार कर्ण का जन्म कैसे हुआ, कुंती ने उसे जल में क्यों छोड़ा, और इंद्र ने उसका कवच क्यों माँगा। पूरी कथा स्रोत सहित।

KATHAAYA संपादकीय टीम··6 मिनट पढ़ें
कर्ण का जन्म: कुंती ने अपने पहले पुत्र को नदी में क्यों बहाया? महाभारत की कथा

महाभारत की सबसे मार्मिक कथाओं में से एक एक कन्या से शुरू होती है, जिसने जिज्ञासा में एक मंत्र पढ़ लिया था। उस एक क्षण का नतीजा था एक पुत्र, जिसे जन्म के बाद पानी में छोड़ दिया गया। वही पुत्र आगे चलकर कर्ण कहलाया। इस लेख में हम वही क्रम देखेंगे जो महाभारत के आदि पर्व (संभव पर्व) के खंड १११ में आता है, और जहाँ पाठ चुप है वहाँ हम भी चुप रहेंगे।

शूर की पुत्री पृथा और कुंतिभोज का घर

यादवों में शूर नाम के एक प्रमुख थे, जो वसुदेव के पिता थे। उनकी एक पुत्री थी, पृथा, जिसके रूप की बराबरी पृथ्वी पर कोई नहीं कर सकता था। शूर सदा सत्य बोलने वाले थे। अपने पुराने वचन के अनुसार उन्होंने अपनी पहली संतान, पृथा, अपने निःसंतान मित्र और चचेरे भाई कुंतिभोज को दे दी। इसीलिए पृथा आगे चलकर कुंती कहलाईं। कुंतिभोज के घर में पृथा के जिम्मे ब्राह्मणों और अतिथियों के आतिथ्य का काम था।

दुर्वासा का वरदान: किसी भी देवता को बुलाने का मंत्र

एक दिन उनकी सेवा से कठोर व्रत वाले, धर्म के गूढ़ रहस्य जानने वाले ऋषि दुर्वासा प्रसन्न हो गए। पाठ के अनुसार, ऋषि ने अपने तपोबल से आने वाले संकट का समय पहले ही देख लिया था। यह संकट वही था जो आगे पांडु को मिलने वाले शाप से जुड़ा है। इसलिए उन्होंने पृथा को एक मंत्र दिया, जिससे वे अपनी पसंद के किसी भी देवता को बुला सकती थीं। ऋषि ने कहा कि इस मंत्र से तुम जिस देवता को बुलाओगी, वह ज़रूर आएगा और तुम्हें संतान देगा।

जिज्ञासा और सूर्यदेव

पृथा उस समय कन्या थीं। मंत्र के बारे में उनके मन में जिज्ञासा जाग उठी और उन्होंने सूर्यदेव को बुला लिया। मंत्र बोलते ही उन्होंने तेज से भरे सूर्यदेव को अपनी ओर आते देखा। इस अद्भुत दृश्य से वे चकित रह गईं। सूर्यदेव ने कहा कि मैं आ गया हूँ, बताओ मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ।

पृथा ने उत्तर दिया कि एक ब्राह्मण ने मुझे यह मंत्र वरदान में दिया था, और मैंने तो केवल उसे परखने के लिए आपको बुलाया है। उन्होंने क्षमा माँगी। सूर्यदेव ने कहा कि वे जानते हैं कि दुर्वासा ने यह वरदान दिया है, पर उनका आना व्यर्थ नहीं जा सकता, और बुलाए जाने पर उसका फल होना ही चाहिए। पृथा को लज्जा थी और अपने बंधुओं का भय भी, इसलिए वे पहले सहमत नहीं हुईं। सूर्यदेव ने उन्हें समझाया, और उसी क्षण एक पुत्र का जन्म हुआ।

कवच और कुंडल के साथ जन्मा बालक

वह बालक जन्म से ही प्राकृतिक कवच पहने हुए था, और उसका मुख कुंडलों से दमक रहा था। पाठ उसे शस्त्र चलाने वालों में सबसे आगे और देवताओं के बालक जैसा सुंदर बताता है। जन्म के बाद सूर्यदेव ने पृथा को उनका कन्या-भाव लौटा दिया और स्वर्ग चले गए।

पानी में छोड़ने का निर्णय

अपने पुत्र को देखकर पृथा दुख से भर गईं और बहुत देर तक सोचती रहीं कि अब क्या करना उचित है। अपने बंधुओं के भय से उन्होंने इस बात को छिपाने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने बलवान पुत्र को पानी में छोड़ दिया। यही इस कथा का सबसे करुण मोड़ है, और पाठ उसे बिना सफाई दिए, बस इसी तरह दर्ज करता है।

राधा और सूत पिता: वसुसेन का बचपन

सूत जाति के राधा के पति ने पानी से उस बालक को उठा लिया। उन्होंने और राधा ने उसे अपने पुत्र की तरह पाला। कवच और कुंडलों के साथ जन्म लेने के कारण उन्होंने उसका नाम वसुसेन रखा। यानी जिसे राजकुल ने छोड़ा, उसे एक सूत परिवार ने अपनाया, और यही वह पहचान है जिसे कर्ण आगे चलकर उम्र भर साथ लेकर चला।

इंद्र का कवच माँगना और कर्ण नाम की कथा

पाठ के अनुसार वसुसेन ने सब अस्त्र-शस्त्रों में निपुणता पाई। एक दिन अपने पुत्र अर्जुन के हित के लिए इंद्र ने ब्राह्मण का रूप लिया और वसुसेन से उसका प्राकृतिक कवच माँग लिया। वसुसेन ने अपना कवच उतारकर, हाथ जोड़कर, इंद्र को दे दिया। इंद्र उसकी दानशीलता से बहुत प्रसन्न हुए और बदले में उसे एक श्रेष्ठ शक्ति (भाला) दिया। उन्होंने कहा कि जिसे भी तुम जीतना चाहोगे, वह इस शक्ति से मारा जाएगा, पर यह एक ही बार काम करेगी। अपना कवच काट देने के कारण ही वसुसेन आगे कर्ण कहलाया, यानी जिसने अपना आवरण स्वयं उतार दिया।

इस कथा से हम क्या समझ सकते हैं

पहली बात, पाठ में दुर्वासा का वरदान कुंती के जीवन के दो बड़े मोड़ों को जोड़ता है: कर्ण का जन्म और बाद में पांडवों का जन्म। दूसरी बात, पृथा का निर्णय पाठ में भय का निर्णय है, किसी दुष्टता का नहीं, और कथा उसे सरल निंदा से अलग रखती है। तीसरी बात, कर्ण के जीवन की दोनों बड़ी घटनाएँ, जन्म और कवच का दान, किसी और के निर्णय से तय होती दिखती हैं। चौथी बात, इस कथा के ब्योरे अलग-अलग परंपराओं, पुराणों और टीवी धारावाहिकों में थोड़े भिन्न मिलते हैं, इसलिए इन्हें ग्रंथ के पाठ से मिलाकर देखना अच्छा रहता है। यहाँ हमने के. एम. गांगुली के अंग्रेज़ी अनुवाद के आदि पर्व (संभव पर्व) खंड १११ को आधार बनाया है, जिसे सार्वजनिक डोमेन में पढ़ा जा सकता है।

यह भी याद रखने लायक है कि इस खंड के अंत तक पाठ कर्ण को अर्जुन का प्रतिद्वंद्वी नहीं बताता; वह जिस पक्ष से जुड़ेगा, वह महाभारत के आगे के हिस्सों की कथा है, जिसे हम यहाँ नहीं जोड़ रहे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कर्ण के जन्म की कथा महाभारत में कहाँ आती है? आदि पर्व के संभव पर्व में, खंड १११ में।

कुंती ने कर्ण को पानी में क्यों छोड़ा? पाठ के अनुसार, अपने बंधुओं के भय से, और इस बात को छिपाने के लिए।

कर्ण को किसने पाला? सूत जाति के राधा के पति ने और राधा ने, जिन्होंने उसे अपने पुत्र की तरह पाला।

कर्ण का नाम वसुसेन क्यों रखा गया? क्योंकि वह जन्म से कवच और कुंडलों के साथ था।

कर्ण नाम कैसे पड़ा? पाठ के अनुसार, इंद्र को अपना कवच काटकर दे देने के कारण।

क्या यह कथा सभी ग्रंथों में एक जैसी है? नहीं। यह महाभारत के आदि पर्व का वृत्तांत है, और अन्य ग्रंथों और लोक-परंपराओं में ब्योरे अलग मिलते हैं।

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